शब्द ggggggggg
प्रकृति कि हरी चादर पर,
पद्म-पत्र औ
गुलाब की सुकोमल पंखड़ियों पर
तुषार पतन के पश्चात्
स्वप्नों की शब्दावली से
भगवाई-भोर ने
शब्द एक अद्वितीय शान्ति
पसन्द किया।
गिरि कन्दराओं के तिमिरालय
से लेकर
आभामय-उपवन के
तरु-तमाल तक ने
निज हर्ष को नहीं मन्द किया।
प्रीति-अप्रीति की
आशा-आशंकाओं से परे,
कर उठा पीहू-पीहू
समय का पपीहरा
तब
दिन चढ़े दिनकर ने
उच्च-प्रासादों के प्रांगण में
प्रस्फुटित अवर्णनीय आन्नद
को निहार औ
अनचाहे अन्जाने ही
समीप ही
निरावलम्बन में निहारते
नीड़ों औ क्षीणतर कुटीरों में
स्थित विवशताओं के
चिथड़ों से लिपटी,
कुण्ठावसादों के प्रागंण में सिपटी
जर्जर-इच्छाओं के
मरणासन्न-मुख को घूरा
इसी अन्तराल में
अगणित अर्थों की गलियों से
गुज़रता रहा वह शब्द
खिन्न होकर
चिथड़ाई अपनी आस्था लेकर
अन्यमनस्कता में स्वीकार
उसने नहीं छन्द किया।
पश्चिम के भाल पर
सिन्दूर छिटकने से पूर्व ही,
शैल-शिखर पर झूमते वृक्ष-बाहों में
संध्या के आलिंगन-बद्ध
होने से पूर्व ही
दिवस की वेदी पर
आह!
उस शब्द के
सारे अक्षर
बिखर गये।
***
समानान्तरgggggggggउर में उफनते एक टीस को
देने हेतु अभिव्यक्ति
पाँखें आर्द्र कर पलकों की
टूक-टूक हुईं बूँदें
आँसू की,
रहा चिथड़ाया ह्दय
निर्द्वन्द्व।
जैसे
टूटा दायरा मानयताओं का
हुआ ह्रास रहस्यमय-तादात्मय का
कवियों की कल्पना का आधार
अपनी ज्योत्स्ना के तार-तार
को अब गिनता शशधर
हो विकल निस्पन्द।
सीढ़ियाँ तीन चढ़ कर
पीढ़ियाँ तीन गढ़ कर
धूल पंख से झाड़ कर
मोम पाषाण से बन कर
हौले से जीवन
पिघला जाये।
जैसेः
दीर्घ व नीरस
प्रदर्शन-व्यर्थाडम्बर
से विरक्त होकर
कोई धीरे से बाहर
दर्शक-दीर्घा त्याग कर
निकल जाये।
***
तुम कहो तो gggggggggg
तुम कहो तोः
किसी गहरी खाई के
समीपस्थ
दुर्गम-दुर्ग की दीवार
से सटकर सोपान
बन जाऊँ,
ताकि
मेरे शीश पर पाँव रखकर
तुम शिखर को उठ जाओ।
तत्पश्चात्
तुम्हारे ही पदाघात से
मेरे रसातल-चुम्बन का
मुझे दुःख न होगा
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि अधिकार गढ़ पर
तुमने पा लिया है।
तुम कहो तोः
तीव्रतर गति से
मैं करता मृत्यु का
आलिंगन चलूँ
तुम्हारी गवेषणा हेतु,
ताकि
मानव का अस्तित्व
विषय पर
कोई शोध-ग्रन्थ
लिख पाओ।
तत्पश्चात्
मेरी अर्थी को
कोई कंधा भी
न मिल पाये तो
मुझे दुःख न होगा
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि शाशवत-सुनाम
तुमने पा लिया है।
तुम कहो तोः
इन नयनों में
नीरधि को बसा लूँ मैं,
ताकि
नीर की अभिव्यक्ति
हेतु
तुम्हें
शब्द-कोश
न ढूँढना पड़ जाये।
तत्पश्चात्
दिवालोक में
कदाचित् मुझे
टटोलना लाठी पड़ जाये
दुःख न होगा तथापि मुझे
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि गीत जीवन का
तुमने गा लिया है।
तुम कहो तोः
कोई विदूषक
या हास्य का पात्र
ही बन जाऊँ,
ताकि
अस्तित्व को मेरे
कर नीलाम
तुम खिलखिला सको।
तत्पश्चात्
भले ही
मेरा व्यक्तित्व
जाये श्रीहीन
दुःख नहीं होगा तथापि मुझे
मिल जाये यदि आभास मात्र
कि दिव्य-जीवन
तुमने पा लिया है।
***आकांक्षा
gggggggg
है आकांक्षा
कि बनूँ
एक कूप
बीहड़ बियाबान
से गुज़रती
सर्पीली-पगडण्डी का,
ग्रीष्म की
चिलचिलाती
दुपहरी में
क्लान्त श्रान्त
पथिकों
की तृषा-शान्त
करते-करते
जो न
स्वयं
सूख जाय।
या
एक दृग
बाँस-बबूल
तक के
उर की टीम को
जो सहलाये,
निखिल-ब्रह्माण्ड
की
क्षुधा को
अन्न-ब्रह्म
के
प्रथम-सोपान
तक
पहँचाकर
मिट स्वतः
जिसकी
भूख जाय
अथवा
एक जिह्वा
अमृतमय-गिरा
आलोड़ित कर
दिग-दिगन्त को
जो
आप्यायित करे,
दण्ड-प्रहार, निशा-अहर
मास औ
संवत्सर
का
विलयन कर
सत्य-शिव-सुन्दर
को
समन्वित कर
जो स्वयं
अन्ततः
न हो
मूक जाय।
***
श्रेष्ठतर
ggggggg
मैं एक-जल-कण
सोचता
किसी सीपी
के जठर में
भर जाऊँ।
तभी लगताः
होगा श्रेष्ठतर
यदि
मेघ बन बरसूँ
औ तृषित–अवनि–अधर
को तर
कर जाऊँ।
***-डॉ॰राजेन जयपुरिया